सहरसा। कहते हैं कि सपनों की उड़ान के लिए बड़े संसाधनों की नहीं, बल्कि बड़े हौसलों की जरूरत होती है। सहरसा जिले के एक छोटे से गांव से निकली एक ऐसी ही प्रेरणादायक कहानी आज हजारों युवाओं के लिए उम्मीद की किरण बन गई है। गरीबी, अभाव और संघर्ष के बीच पले-बढ़े शुभम कुमार ने 70वीं BPSC परीक्षा में 831वीं रैंक हासिल कर अपर जिला परिवहन पदाधिकारी (ADTO) का पद प्राप्त किया है। उनकी सफलता ने न केवल उनके परिवार बल्कि पूरे जिले को गौरवान्वित कर दिया है।

सौर बाजार प्रखंड के सुहथ पंचायत अंतर्गत हनुमान नगर चकला गांव निवासी शुभम कुमार के पिता सुरेश कुमार साह एक साधारण किसान हैं। खेती के साथ-साथ वे वर्षों से आटा चक्की चलाकर परिवार का भरण-पोषण करते रहे हैं। सीमित आय और आर्थिक चुनौतियों के बावजूद उन्होंने कभी अपने बच्चों की शिक्षा से समझौता नहीं किया। दिनभर चक्की की मशीनों के शोर के बीच मेहनत करने वाले पिता की आंखों में एक ही सपना था—बेटा पढ़-लिखकर बड़ा अधिकारी बने।आज वह सपना सच हो गया है।

शुभम की सफलता सिर्फ एक परीक्षा पास करने की कहानी नहीं है, बल्कि यह उस संघर्ष की कहानी है जिसमें एक पिता ने अपनी जरूरतों को पीछे रखकर बेटे के भविष्य को प्राथमिकता दी, एक बड़े भाई ने अपने सपनों के साथ छोटे भाई के सपनों को भी संजोया और एक बेटे ने परिवार के त्याग को अपनी मेहनत की ताकत बना लिया।

गांव के स्कूल से पढ़ाई शुरू करने वाले शुभम शुरू से ही मेधावी छात्र रहे। वर्ष 2016 में गजाधर साहू उच्च विद्यालय, सौर बाजार से मैट्रिक और 2018 में एमएलटी कॉलेज, सहरसा से विज्ञान संकाय में इंटरमीडिएट की पढ़ाई पूरी की। इसके बाद उन्होंने पटना कॉलेज से वर्ष 2021 में अर्थशास्त्र (Economics) में स्नातक किया। ज्ञान की प्यास यहीं नहीं रुकी। उन्होंने देश के प्रतिष्ठित संस्थान Jawaharlal Nehru University (JNU) से हिंदी साहित्य में स्नातकोत्तर की पढ़ाई की और फिर पीएचडी पूरी की। उनका शोध विषय था—“मैथिली लोकगाथा गीत भगैत : एक विश्लेषणात्मक अध्ययन”।

शुभम की सफलता के पीछे उनके बड़े भाई अभिषेक कुमार की भूमिका भी किसी प्रेरणादायक कहानी से कम नहीं है। दो वर्ष पूर्व अभिषेक स्वयं BPSC परीक्षा पास कर 10+2 शिक्षक बने थे। उन्होंने अपने छोटे भाई की पढ़ाई और तैयारी में हर संभव सहयोग किया। आर्थिक, मानसिक और शैक्षणिक हर स्तर पर वे शुभम के साथ खड़े रहे।

शुभम बताते हैं कि उन्होंने UPSC की तैयारी के दौरान ही BPSC परीक्षा दी थी। पहले ही प्रयास में मिली यह सफलता उनके वर्षों की मेहनत, अनुशासन और आत्मविश्वास का परिणाम है।

सफलता के इस मुकाम पर पहुंचकर भी शुभम बेहद विनम्र हैं। वे अपनी उपलब्धि का श्रेय सबसे पहले अपने माता-पिता को देते हैं। शुभम कहते हैं, “जब भी मैं थकता था, पिता की मेहनत याद आती थी। चक्की पर दिन-रात काम करते हुए उन्हें देखकर लगता था कि मुझे उनके सपनों को पूरा करना है। यही सोच मुझे लगातार आगे बढ़ाती रही।”

शुभम अपने जीवन में प्रेरणा देने वाले लोगों को भी नहीं भूलते। वे अपने दिवंगत शिक्षक उमेश सर, बड़े भाई एवं शिक्षक नागेंद्र कुमार तथा पूर्व बीडीओ और वर्तमान विधायक Dr. Gautam Krishna के मार्गदर्शन को अपनी सफलता का महत्वपूर्ण आधार मानते हैं। उनका कहना है कि इन लोगों ने हर कठिन दौर में उनका मनोबल बढ़ाया और आगे बढ़ने की प्रेरणा दी।

आज शुभम की सफलता पर पूरे गांव में उत्सव जैसा माहौल है। लोग मिठाइयां बांट रहे हैं, बधाइयों का तांता लगा हुआ है और हर कोई इस उपलब्धि को अपनी उपलब्धि मान रहा है। ग्रामीणों का कहना है कि हनुमान नगर चकला गांव के इतिहास में यह एक गौरवपूर्ण क्षण है।

शुभम कुमार की कहानी उन लाखों युवाओं के लिए एक संदेश है जो संसाधनों की कमी को अपनी कमजोरी मान लेते हैं। यह कहानी बताती है कि यदि लक्ष्य स्पष्ट हो, मेहनत ईमानदार हो और परिवार का आशीर्वाद साथ हो तो किसी भी गांव की पगडंडी से निकलकर प्रशासनिक सेवा के बड़े पद तक पहुंचा जा सकता है।

आटा चक्की की आवाजों के बीच पलने वाला एक सपना आज प्रशासनिक सेवा की ऊंचाइयों तक पहुंच चुका है। यह सिर्फ शुभम की सफलता नहीं, बल्कि उस हर पिता के संघर्ष की जीत है जो अपने बच्चों के लिए बेहतर भविष्य का सपना देखता है।