हेमलता म्हस्के
समाजसेविका सह साहित्यकार

यह  सच है कि मौजूदा दौर में दुनिया  भर में  तथाकथित विकास का जो ढांचा विकसित हो रहा है उसके कारण लोगों में हिंसा बढ़ रही है और इस बढ़ती हुई हिंसा के कारण पर्यावरण और जैव विविधता पर भी संकट बढ़ गया है। मानव  की प्रवृत्तियों  में  जीव जंतु  सहित वनस्पति जगत के प्रति भी क्रूरता  बढ़ रही  है।  जबकि यह संसार अकेले केवल मनुष्य के लिए कभी भी  नहीं रहा  है। इस धरती पर  सदियों से संसार का जो स्वरूप  रहा है उसमे सिर्फ मनुष्य मात्र का अस्तित्व नहीं रहा है बल्कि मनुष्य  के साथ साथ  जीवजंतुओं  और पेड़ पौधों  का भी अस्तित्व रहा है। यह संसार इन सब की  साझा संस्कृति का आधार रहा है ।  राजस्थान के जालोर जिले के पीरा राम घायल पिछले दो दशकों में देश और दुनिया के लिए वे  एक ऐसे अद्भुत मिसाल बन गए हैं यह पाठ समझने के लिए कि यह संसार सिर्फ  मनुष्यों के लिए नहीं है। हमारे दिल में जीव जंतुओं और वनस्पति जगत के लिए भी करुणा होनी चाहिए। क्योंकि  पीरा राम  घायल एक तरफ जीव जंतुओं के कल्याण के लिए  अनथक काम कर रहे हैं वहीं दूसरी तरफ  जंगलों के विकास के लिए  निरंतर  अनगिनत पेड़ पौधे भी लगा रहे हैं। पीरा राम  घायल के ऐसे अनूठे और अनुपम काम  की खुशबू अब राजस्थान की सीमा से बाहर  निकल कर दुनिया भर में  फैल  रही है।   वे अपने काम से यह संदेश भी दे रहे हैं  कि  यह दुनिया सभी के लिए है और सभी को सभी के हित में सोचना  और काम करना चाहिए। पीरा राम के जीवन और काम  को देखें तो यह भी समझ में आती है कि बेहतर काम के लिए  न किसी से प्रेरणा लेने की जरूरत होती है और न ही बहुत सी दौलत की।  और यह भी कि बेहतर काम को अंजाम देने के लिए बहुत पढ़ा लिखा होना भी जरूरी नहीं है।सबसे ज्यादा जरूरत है करुणा से  भरे एक हृदय की,  जो बेजुबानों के दर्द को  समझ सके।

अपनी इसी करुणा का विस्तार कर पीरा राम घायल ने चकित कर देने वाली ऐसी उपलब्धि हासिल कर ली है जो विरलों को ही  नसीब  हो पाती है। जहां वन्य प्राणियों के सामने आने मात्र से लोग घबरा जाते है लेकिन पीरा राम के लिए न  घबराने वाली बात है और न डरने की। हिरण हो या शेर का बच्चा…पीरा राम की एक आवाज पर सभी दौड़कर इनकी गोद में आकर बैठ जाते हैं। हिरण समेत दूसरे जानवरों से इनकी दोस्ती ऐसी है कि वे उनको गोद में बैठाकर खाना खिलाते हैं। लेकिन, बेजुबानों के साथ इस दोस्ती के पीछे  की कहानी  दिल को छू लेने  वाली है। पहले पीराराम सीआरपीएफ में जालंधर में नियुक्त थे। नौकरी छोड़कर अपने गांव देवड़ा आ गए। यहां पंक्चर बनाने की दुकान खोली, जो उनके गांव से 40 किमी दूर सांचौर में स्थित थी। पीराराम को उस समय जंगल के रास्ते से जाना पड़ता था। एक दिन उनके सामने बंदरों का झुंड सड़क पार करते समय बाइक से टकरा गया और एक बंदरिया की मौत हो गई। बस इस घटना  के बाद एक नए पीरा राम का जन्म हुआ।

कुछ और नहीं, बस एक जिद, एक जुनून और बेजुबानों के दर्द को समझने का एक जज्बा ही  है जिससे पीरा राम  जैसी हस्ती का निर्माण हुआ।  बेजुबानों के  हमदर्द  बनने के बाद पीराराम विश्नोई  की दुनिया ही बदल  गई। करीब 25 साल पहले पीराराम की बेजुबानों के लिए की गई पहल आज  चर्चा का विषय  बन गई है। इन जानवरों के लिए बहुत प्रयास के बाद कोई सरकारी जमीन नही मिली तो  उन्होंने घायल बेजुबान जानवरो के लिए अपनी ही 25 बीघा जमीन पर  आश्रय स्थल बना दिया। जहां जंगली जानवरों का रेस्क्यू करना, उनका इलाज करना उनकी जिंदगी का हिस्सा बन गया। देवड़ा गांव अब जानवरों के लिए एक ऐसा आश्रय स्थल बन गया है जहां वन्य जीव बेखौफ  रहते हैं। यहां जख्मी जानवरों का इलाज और भूखे जानवरों को भरपेट खाना मिलता है । वे  अब तक 3500 जानवरों का रेस्क्यू कर चुके हैं।  घायल हिरणों के इलाज से पीराराम   ने अपने काम की शुरुआत की थी और अब देखते ही देखते ढाई सौ किलोमीटर के इलाके में पीराराम धायल का सेंटर जख्मी जानवरों के लिए एकमात्र सहारा बन गया।उन्होंने  वन्य जीवों के बचाव के लिए रेस्क्यू सेंटर खोलकर अब तक 3250 वन्य जीवों को बचाकर उनको आगे का  जीवन जीने लायक बनाया है।रेस्क्यू सेंटर खोलने के बाद में 2250 हरिण, 260 मोर, 600 नीलगाय, 5 कुरजा, 42 बन्दर, 60 खरगोश, 4 कबर बिज्जु, 6 सैही, 2 उल्लू व 5 बाज को रेस्क्यू कर जान बचा चुके हैं। पीरा राम बताते हैं कि धरती पर मानव के साथ जन्म लेने वाले सभी जीवों को जीने का अधिकार हैं। कई बार मूक प्राणियों के अधिकारों का हनन होने से जीवन संकट को देखते हुए हमने सेवा करना शुरु किया हैं। मैं मूक प्राणियों की सेवा के लिए हमेशा तत्पर रहता हूं।

पीरा राम बताते हैं कि  उनके काम को बहुत सराहना मिल रही है। कई राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय सम्मान और पुरुस्कार भी मिल  चुके हैं लेकिन अपनी जमीन पर जानवरों के लिए  जो आश्रय स्थल बनाया है वहां  छत  नहीं होने से जानवरों को  ठंड, गर्मी और बरसात के दिनों में बहुत मुश्किल होती है।  वे घायल जानवरों के इलाज, दवा और  भोजन का प्रबंध अपनी कमाई  और विभिन्न समुदायों  से मिले सहयोग से कर लेते हैं  लेकिन उन्हें इंतजार रहता है की उन्हें सभी से पर्याप्त मदद मिले। उन्होंने बाकायदा एक संस्था भी बनाई है जिसके जरिए से वे  जानवरों की  सेवा के सभी तरह के प्रबंध करने की कोशिश में जुटे हैं।