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  • संघर्ष में यदि कोई सच्चा साथी है, तो वह है हमारा स्वयं का मन

    आज की युवा पीढ़ी अक्सर छोटी-छोटी समस्याओं और उलझनों से घबरा जाती है। कई बार परिस्थितियाँ कठिन नहीं होतीं, बल्कि हार जाने का डर उन्हें पीछे खींच लेता है। जबकि सच्चाई यह है कि युवाओं के भीतर अपार मेहनत, अटूट विश्वास और चट्टान जैसी हिम्मत मौजूद होती है—जरूरत है तो बस उस डर पर विजय


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    अमृता ,सहायक शिक्षिका

    आज की युवा पीढ़ी अक्सर छोटी-छोटी समस्याओं और उलझनों से घबरा जाती है। कई बार परिस्थितियाँ कठिन नहीं होतीं, बल्कि हार जाने का डर उन्हें पीछे खींच लेता है। जबकि सच्चाई यह है कि युवाओं के भीतर अपार मेहनत, अटूट विश्वास और चट्टान जैसी हिम्मत मौजूद होती है—जरूरत है तो बस उस डर पर विजय पाने की।

    मनुष्य का जीवन एक नन्हे पौधे के अंकुर के समान है, जो धरती की गोद से निकलकर पहली बार इस संसार से परिचित होता है। सूरज की किरणें, ओस की बूंदें और हवा के झोंके उसे जीवन का स्पर्श कराते हैं। धीरे-धीरे वह बढ़ता है, मजबूत होता है और एक विशाल वृक्ष बनने की ओर अग्रसर होता है। इस पूरे सफर में उसे संघर्ष, धैर्य और निरंतर प्रयास की आवश्यकता होती है। ठीक इसी तरह मनुष्य का जीवन भी विकास और संघर्ष की एक सतत यात्रा है।

    “मानव” होना केवल जन्म लेने तक सीमित नहीं है, बल्कि स्वयं को पहचानने और अपने भीतर के श्रेष्ठ गुणों को विकसित करने की एक निरंतर प्रक्रिया है। प्रेम, दया, कर्तव्यनिष्ठा और परिश्रम जैसे गुण भले ही आदर्श लगें, लेकिन यदि इनका थोड़ा-सा अंश भी जीवन में उतर आए, तो जीवन सार्थक हो सकता है।

    वर्तमान समय में दिखावे और एक-दूसरे से आगे निकलने की होड़ ने इंसान को भीतर से कमजोर कर दिया है। यही कारण है कि इन मूल्यों को अपनाना अब एक आंतरिक संघर्ष बन चुका है। इस संघर्ष में यदि कोई सच्चा साथी है, तो वह है हमारा स्वयं का मन—और सहायक है हमारा परिवेश।

    अक्सर देखा जाता है कि व्यक्ति को आधी उम्र बीत जाने के बाद भी स्वयं को समझने का अवसर नहीं मिल पाता। ऐसे में युवाओं से यह अपेक्षा करना और भी चुनौतीपूर्ण हो जाता है। इस उम्र में वे बाहरी आकर्षण और चकाचौंध की ओर अधिक खिंचते हैं।

    महाभारत का प्रसंग इस संदर्भ में मार्गदर्शक है। जब अर्जुन मोह और भ्रम में पड़ गए थे, तब श्रीकृष्ण ने उन्हें आत्मबोध कराया और उनके कर्तव्य का स्मरण दिलाया। आज के समय में सबसे बड़ा प्रश्न यही है—
    “हमारे जीवन में कृष्ण कौन बनेगा?”

    इसका उत्तर कहीं बाहर नहीं, बल्कि हमारे भीतर ही छिपा है। आवश्यकता है स्वयं को पहचानने की, अपने लक्ष्य को स्पष्ट करने की और उस पर दृढ़ रहने की। जीवन में बाधाएं आएंगी, समस्याएं घेरेंगी, लेकिन संभव है कि आज की चुनौती ही कल किसी बड़ी समस्या का समाधान बन जाए।

    इसलिए जरूरी है कि हम हार के डर को अपने ऊपर हावी न होने दें। अर्जुन की तरह लक्ष्य पर ध्यान केंद्रित रखें।
    जब संकल्प मजबूत होगा, तो न केवल गांडीव हमारा होगा, बल्कि हर व्यक्ति अपने जीवन का कुरुक्षेत्र भी जीत सकेगा।

    नोट : ये आलेख लेखक के निजी विचार है. सम्पादकीय समूह के सहमत या असहमत होना कोई विषय नहीं है.

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