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  • बिहार के राजनीतिक क्षितिज पर नया सूर्य: नीतीश युग का अवसान और सम्राट चौधरी की चुनौतियां

    बिहार की जनता अब 2005 वाली जनता नहीं है। आज का युवा 'सड़क और बिजली' को उपलब्धि नहीं मानता, बल्कि इसे अपना बुनियादी अधिकार समझता है। सम्राट चौधरी के समक्ष तीन सबसे बड़ी चुनौतियां खड़ी हैं:


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    डॉ. रवि प्रकाश सिंह/ सम्पादकीय लेख

    बिहार की राजनीति में सत्ता का हस्तांतरण केवल एक मुख्यमंत्री के स्थान पर दूसरे का बैठना भर नहीं है, बल्कि यह एक राजनीतिक दर्शन से दूसरे की ओर प्रस्थान है। पिछले दो दशकों से बिहार की राजनीति ‘नीतीश कुमार’ नामक धुरी के इर्द-गिर्द घूमती रही। विकासवाद और सुशासन के जिस नैरेटिव को नीतीश कुमार ने गढ़ा था, आज वह अपने चरम से गुजरकर एक नए नेतृत्व की प्रतीक्षा कर रहा है। भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष रहे और अब मुख्यमंत्री पद की ओर अग्रसर सम्राट चौधरी का उभार बिहार की राजनीति में एक बड़े संरचनात्मक बदलाव का संकेत है। प्रश्न यह नहीं है कि चेहरा बदल गया है, प्रश्न यह है कि क्या बिहार की नियति भी बदलेगी?

    अतीत का आईना: बिमारू से सुशासन तक का सफर- यदि हम बिहार के अतीत पर दृष्टिपात करें, तो 1990 के दशक का बिहार राजनीतिक चेतना के लिहाज से अत्यंत मुखर था, लेकिन प्रशासनिक और आर्थिक मोर्चे पर वह ‘जंगलराज’ और ‘बिमारू’ की श्रेणी में खड़ा था। 2005 में जब नीतीश कुमार ने बागडोर संभाली, तो उनके सामने सबसे बड़ी चुनौती थी—राज्य की साख को पुनर्स्थापित करना। उन्होंने ‘न्याय के साथ विकास’ का मंत्र दिया। सड़कों का जाल, स्कूलों में छात्राओं की साइकिलें और कानून का इकबाल, ये नीतीश कुमार की आरंभिक सफलताओं के स्तंभ थे।

    किंतु, राजनीति का स्वभाव परिवर्तनशील है। दो दशकों के शासन के बाद ‘थकावट’ (Fatigue Factor) और गठबंधन बदलने की बारंबारता ने नीतीश कुमार की उस छवि को धुंधला कर दिया, जिसे उन्होंने बड़ी मेहनत से बनाया था। बिहार जो कभी शिक्षा और राजनीति का केंद्र था, वह पलायन और बेरोजगारी के चक्रव्यूह में फंस गया। आज जब सम्राट चौधरी इस कुर्सी की ओर बढ़ रहे हैं, तो उन्हें एक ऐसा बिहार मिल रहा है जो स्थिरता तो चाहता है, लेकिन वह ठहराव से ऊब चुका है।

    सम्राट चौधरी: विरासत और व्यक्तित्व का द्वंद्व- सम्राट चौधरी का मुख्यमंत्री बनना बिहार में एक बड़े सामाजिक समीकरण के सफल होने का प्रतीक है। वे केवल एक नेता नहीं, बल्कि एक खास वर्ग की मुखर आवाज बनकर उभरे हैं। राजनीति विज्ञान के नजरिए से देखें तो उनका उभार ‘पहचान की राजनीति’ और ‘विकास की आकांक्षा’ का संगम है। उनके सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि क्या वे खुद को केवल एक ‘जातीय नेता’ से ऊपर उठाकर एक ‘जननेता’ के रूप में स्थापित कर पाएंगे?

    नीतीश कुमार की ताकत उनकी सर्व-समावेशी छवि थी (कम से कम उनके शुरुआती वर्षों में)। सम्राट चौधरी को यह समझना होगा कि बिहार की सत्ता का मार्ग भले ही समीकरणों से होकर गुजरता हो, लेकिन सत्ता की उम्र केवल ‘परफॉरमेंस’ से तय होती है। उनके पास अपनी सांगठनिक क्षमता और आक्रामक तेवर हैं, लेकिन मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठकर उन्हें ‘आक्रामकता’ और ‘धैर्य’ के बीच एक महीन संतुलन बनाना होगा।

    जनता की अपेक्षाएं और आधुनिक बिहार की चुनौतियां- बिहार की जनता अब 2005 वाली जनता नहीं है। आज का युवा ‘सड़क और बिजली’ को उपलब्धि नहीं मानता, बल्कि इसे अपना बुनियादी अधिकार समझता है। सम्राट चौधरी के समक्ष तीन सबसे बड़ी चुनौतियां खड़ी हैं:

    औद्योगिकीकरण और पलायन: बिहार से प्रतिभा और श्रम का पलायन एक रिसता हुआ घाव है। जब तक बिहार में निजी निवेश और उद्योगों का वातावरण नहीं बनेगा, तब तक ‘विकास’ शब्द बेमानी रहेगा। क्या सम्राट चौधरी बिहार को ‘इन्वेस्टमेंट डेस्टिनेशन’ बना पाएंगे?

    शिक्षा और स्वास्थ्य का ढांचा: बिहार के शिक्षण संस्थान आज भी सत्रों की देरी और संसाधनों की कमी से जूझ रहे हैं। स्वास्थ्य सेवाएं पटना के कुछ बड़े अस्पतालों तक सिमटी हुई हैं। ग्रामीण बिहार को आधुनिक चिकित्सा की दरकार है।

    प्रशासनिक सुधार: नीतीश कुमार के दौर में नौकरशाही पर अत्यधिक निर्भरता की शिकायतें रही हैं। सम्राट चौधरी को प्रशासन में जन-भागीदारी और पारदर्शिता को नया आयाम देना होगा।

    क्या वे ‘नीतीश’ बन पाएंगे या उनसे आगे निकलेंगे?-
    अक्सर यह चर्चा होती है कि क्या सम्राट चौधरी, नीतीश कुमार का विकल्प बन पाएंगे? वास्तव में, उन्हें नीतीश कुमार बनने की आवश्यकता नहीं है, बल्कि उन्हें नीतीश कुमार की कमियों को पाटते हुए उनसे आगे निकलना होगा। नीतीश कुमार ने बिहार को ‘गड्ढे’ से निकाला था, अब सम्राट चौधरी की जिम्मेदारी बिहार को ‘उड़ान’ देने की है।

    असफलता का भय हमेशा बना रहता है, विशेषकर तब जब राज्य की राजनीति अत्यंत जटिल हो। यदि वे केवल चुनावी जीत-हार के जोड़-घटाव में उलझे रहे, तो वे एक और ‘संक्रमणकालीन’ मुख्यमंत्री बनकर रह जाएंगे। लेकिन यदि उन्होंने बिहार की मौलिक समस्याओं—जैसे बाढ़ का स्थायी समाधान, कृषि आधारित उद्योगों का विस्तार और आईटी हब का निर्माण—पर ध्यान केंद्रित किया, तो वे निश्चित रूप से नीतीश कुमार की छाया से बाहर निकलकर एक नया ‘सम्राट युग’ शुरू कर सकते हैं।

    बिहार की राजनीति अब ‘मंडल’ और ‘कमंडल’ के पुराने खांचों से बाहर निकलकर ‘आकांक्षाओं की राजनीति’ की ओर बढ़ रही है। सम्राट चौधरी का कार्यकाल यह तय करेगा कि भाजपा बिहार में अपने दम पर कितनी गहरी जड़ें जमा चुकी है। आगामी समय में हम देखेंगे कि ध्रुवीकरण और विकास के बीच एक रस्साकशी होगी।

    अंततः, बिहार एक ऐसे मोड़ पर खड़ा है जहां उसे एक विजनरी नेतृत्व की आवश्यकता है। सम्राट चौधरी के पास वह ऊर्जा है, जो युवाओं को आकर्षित करती है। यदि वे अपनी इस ऊर्जा को नीतिगत सुधारों में बदलने में सफल रहे, तो बिहार का भविष्य उज्ज्वल है। बिहार को अब ‘पिछड़ा’ कहलाने से चिढ़ होने लगी है; उसे अब ‘अग्रणी’ होने का गौरव चाहिए। मुख्यमंत्री के रूप में सम्राट चौधरी का सफर केवल उनके व्यक्तित्व की परीक्षा नहीं है, बल्कि यह बिहार की साख को वैश्विक पटल पर फिर से स्थापित करने की एक अग्निपरीक्षा भी है। राजनीति विज्ञान के छात्र के रूप में हम इसे ‘शक्ति के हस्तांतरण’ के बजाय ‘संकल्प के हस्तांतरण’ के रूप में देख रहे हैं। समय ही बताएगा कि क्या सम्राट बिहार के नए भाग्यविधाता सिद्ध होंगे।

    लेखक परिचय : डॉ. रवि प्रकाश सिंह भूपेंद्र नारायण मंडल विश्वविद्यालय (BNMU), मधेपुरा के विश्वविद्यालय राजनीति विज्ञान विभाग में असिस्टेंट प्रोफेसर हैं। आप समसामयिक राजनीति, अंतरराष्ट्रीय संबंधों और बिहार के सामाजिक-आर्थिक विकास के विषयों पर निरंतर शोध और लेखन करते रहे हैं। आपकी पहचान एक मुखर शिक्षाविद और राजनीतिक विश्लेषक के रूप में है।

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