इस जगत में बेजुबान पशु पक्षी हमारे लिए भोजन (दूध, मांस, अंडे), कृषि (खेत जोतना), परिवहन (बोझ ढोना), वस्त्र (ऊन, चमड़ा), दवा (अनुसंधान), और भावनात्मक सहारे (पालतू जानवर) जैसे कई तरीकों से बेहद उपयोगी हैं, जो हमारे जीवन के हर पहलू में योगदान करते हैं और पर्यावरण संतुलन बनाए रखने में भी मदद करते हैं। इतने करने के बावजूद हम पशु पक्षियों के प्रति बर्बर रवैया कायम रखते हैं। यह सच है कि पशुओं पर होने वाले अत्याचार अब और बढ़ रहे हैं । अत्याचार रोकने के लिए बाकायदा कानून भी बने हुए हैं बावजूद सामाजिक जीवन में हमारे आसपास जो पशु पक्षी हैं उनके प्रति हम न सिर्फ उदासीन रहते हैं बल्कि काफी क्रूर व्यवहार करने से भी बाज नहीं आते।
इस बार पहली बार देश और दुनिया को यह जानने का मौका मिलेगा कि ये पशु पक्षी देश की रक्षा में भी अपनी महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वाह कितनी कठिनाइयों के बावजूद करते हैं। गणतंत्र दिवस परेड में इस बार कर्तव्य पथ पर बेजुबान पशुओं का बेहद खास नजारा देशवासियों को देखने को मिलेगा। गणतंत्र परेड में पहली बार बड़े स्तर पर पशु पक्षी भाग लेंगे। यह पशु दस्ते भारतीय सेना की ताकत दिखाने के अलावा ये भी बताएंगे कि राष्ट्रीय सुरक्षा में उनका योगदान कितना अहम है। परेड में शामिल होने वाले इस खास दस्ते में दो बैक्ट्रीयन ऊंट, चार जांस्कर पोनी, चार शिकारी पक्षी, भारतीय नस्ल के 10 कुत्ते और छह पारंपरिक सैन्य कुत्ते भी शामिल होंगे। दस्ते की बैक्ट्रीयन ऊंट करेंगे, इन्हें हाल ही में लद्दाख के ठंडे रेगिस्तानी इलाकों में तैनात किया गया है। ये ऊंट बहुत ठंडा मौसम और 15000 फीट से ज्यादा ऊंचाई पर आसानी से कम कर सकते हैं।
ये ऊंट लद्दाख की नुब्रा घाटी में पाए जाते हैं। उनकी पीठ पर दो कूबड़ होते हैं। ये ऊंट 250 किलोग्राम तक का भार उठा सकते हैं और कम से कम पानी और चारे के साथ लंबी दूरी तय कर सकते हैं। आगामी 26 जनवरी को होने वाले परेड में लद्दाख की दुर्लभ और स्थानीय नस्ल के जांस्कर टट्टू भी चलेंगे। छोटे कद के बावजूद ये टट्टू और असाधारण सहन शक्ति के लिए प्रसिद्ध है। ये टट्टू 15000 फीट से अधिक की ऊंचाई पर और 40 डिग्री सेल्सियस तक के तापमान में 40 से 60 किलोग्राम तक का भार लेकर लंबी दूरी तय कर सकते हैं। 2020 में सेना में शामिल होने के बाद से इन्होंने सियाचिन सहित कुछ सबसे कठिन इलाकों में सेवाएं दी हैं। रसद सेवाओं के अलावा जांस्कार टट्टू घुड़सवार ग़श्ती दल में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। ये कभी-कभी एक ही दिन में 70 किलोमीटर तक की दूरी तय करते हैं और जोखिम भरे क्षेत्र में तैनात रहते हैं। परेड में पहली बार पैनी नजर रखने के लिए प्रसिद्ध चार शिकारी पक्षी रैपटर्स भी शामिल होंगे जिनका उपयोग पक्षियों के टकराने से होने वाले नुकसान को नियंत्रित करने और निगरानी करने के लिए किया जाएगा जो परिचालन सुरक्षा के लिए प्राकृतिक क्षमताओं के सेवा के नवल में सी उपयोग की दर्शाता है। रैपटर शब्द लैट्रिन के रिपेयर से बना है जिसका अर्थ पकड़ना यह लूटने होता है यह काम उनके मिजाज के साथ मेल खाता है फिलहाल सी इनका अंतिम ड्रोन वाॅरफेयर के लिए तैयार कर रही है गणतंत्र दिवस परेड में कदमताल करते समय यह मूक योद्धा याद दिलाएंगे कि देश की रक्षा सिर्फ हथियारों से ही नहीं होती सियाचिन की बर्फी चोटियों से लेकर लद्दाख के ठंडे रेगिस्तान तक इन पशुओं ने चुप रहकर मजबूती से अपना फर्ज निभाया है।
परेड का एक महत्वपूर्ण आकर्षण सेना के कुत्ते होंगे, जिन्हें अक्सर भारतीय सेना का मुख्य योद्धा कहा जाता है। मेरठ के आरबीसी केंद्र और कॉलेज में रिमाउंट और पशु चिकित्सा कोर द्वारा पाले पोसे और प्रशिक्षित किए गए। यह कुत्ते आतंकवादी विरोधी अभियानों विस्फोटक और बारूदी सुरंगों का पता लगाने, ट्रैकिंग, सुरक्षा, आपदा राहत और खोज एवं बचाव अभियानों में सैनिकों को सहयोग करते हैं। कई बार इन कुत्तों ने अपनी जान की परवाह किए बिना सैनिकों की जान बचाई है । आत्मनिर्भर भारत अभियान के तहत सेना मुघोल हाउंड, रामपुर हाउंड, चिप्पी पराई, कोम्बई और राजा पलायम जैसे स्वदेशी नस्ल के कुत्तों को भी बड़े पैमाने पर शामिल कर रही है।
इसके बाद परेड में कदम से कदम मिलाकर चलेंगे जांच कर पानी जो लद्दाख की एक दुर्लभ और स्वदेशी घोड़े की नस्ल है यह पानी -40 डिग्री तापमान और बहुत ऊंचाई वाले इलाकों में 40 से 60 किलो वजन लेकर चल सकते हैं।