अफजल राज/ मधेपुरा/ भूपेंद्र नारायण मंडल वाणिज्य महाविद्यालय साहुगढ़, मधेपुरा में शुक्रवार को दो दिवसीय अंतरराष्ट्रीय सेमिनार का शुभारंभ हुआ, जिसमें भारत के स्वतंत्रता संग्राम, जैव विविधता संरक्षण एवं स्वदेशी पारंपरिक ज्ञान (ITK) में आदिवासियों का योगदान विषय पर देश विदेश के विद्वानों ने हाइब्रिड मोड में अपने शोध विचार प्रस्तुत किए। बीएनएमयू के कुलपति प्रो. (डॉ.) बी. एस. झा ने दीप प्रज्वलित कर समारोह का उद्घाटन किया और कहा कि आदिवासी भारतीय इतिहास, संस्कृति और स्वाधीनता संग्राम की असली नींव हैं। उन्होंने स्पष्ट कहा कि तिलका मांझी और बिरसा मुंडा जैसे वीर सपूतों को इतिहास में वह सम्मान नहीं मिला, जिसके वे हकदार थे। कुलपति ने शोधार्थियों को कट–कॉपी–पेस्ट से दूर रहकर जमीनी शोध करने की प्रेरणा दी और महाविद्यालय द्वारा इस महत्वपूर्ण आयोजन की सराहना की।
पूर्व कुलपति प्रो. (डॉ.) रबिंद्र नाथ भगत ने कहा कि 1776 में तिलका मांझी ने अंग्रेजों के खिलाफ संघर्ष का बिगुल फूंका, और आदिवासियों ने कभी गुलामी स्वीकार नहीं की। वहीं प्रो. विद्यानाथ झा ने चिपको आंदोलन में गौरा देवी, माजुली द्वीप के आदिवासी समुदाय और लहरी बाई जैसे नामों को जैव विविधता संरक्षण के प्रतीक रूप में रेखांकित किया। टेक्सास (यूएसए) से जुड़े प्रो. सुभाष चौहान ने आदिवासी समाज की स्वास्थ्य प्रणाली और प्रकृति ज्ञान पर प्रकाश डाला। जेएनयू के डॉ. गंगा सहाय मीणा, पटना यूनिवर्सिटी के प्रो. विनय सोरेन एवं आयोजन समिति अध्यक्ष प्रो. संजीव कुमार ने भी महत्वपूर्ण विचार साझा किए।
कार्यक्रम में बड़ी संख्या में शिक्षकों, शोधार्थियों और छात्रों की उपस्थिति रही। अंत में अतिथियों ने महाविद्यालय परिसर स्थित बोटेनिकल गार्डन का निरीक्षण किया और महापुरुषों की प्रतिमा पर पुष्पांजलि अर्पित की।














