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  • तेजस्वी का सियासी समीकरण दिख रहा है एनडीए पर भारी

    डॉ० नैनिका / चुनाव आयोग ने 16 मार्च 2024 को लोकसभा चुनाव के कार्यक्रम की घोषणा की । चुनाव 7 चरणों में होंगे और मतदान 19 अप्रैल से 1 जून तक होगा। वोटों की गिनती 4 जून को होगी। चुनाव आयोग के इस घोषणा के बाद देश में लोकसभा का चुनाव चल रहा है। अब


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    डॉ० नैनिका / चुनाव आयोग ने 16 मार्च 2024 को लोकसभा चुनाव के कार्यक्रम की घोषणा की । चुनाव 7 चरणों में होंगे और मतदान 19 अप्रैल से 1 जून तक होगा। वोटों की गिनती 4 जून को होगी। चुनाव आयोग के इस घोषणा के बाद देश में लोकसभा का चुनाव चल रहा है। अब तक चार चरणों का मतदान हो चुका है।

    आम तौर पर भारत में किसी भी चुनाव के दौरान चुनावी सरगर्मी रहता है। लेकिन वर्ष 2024 के लोकसभा चुनाव में एक तरह से चुनावी सन्नाटा पसरा हुआ है। यह चुनावी सन्नाटा वर्ष 2004 के लोकसभा चुनाव की याद दिला रहा है। वर्ष 2004 के लोकसभा चुनाव के दौरान चुनावी सरगर्मी सिर्फ गोदी मीडिया में था जबकि आम मतदाता ख़ामोश थे। मीडिया ने स्वर्गीय श्री अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व वाले एनडीए के चुनाव जीतने की घोषणा कर दिया था। लेकिन लोकसभा चुनाव का परिणाम ठीक इसके विपरीत आया था और कांग्रेस के नेतृत्व में यूपीए ने चुनाव में बहुमत हासिल किया था। ठीक उसी तरह से वर्ष 2024 का लोकसभा चुनाव हो रहा है। चुनाव शुरू होने से पहले गोदी मीडिया भाजपा के नेतृत्व वाले एनडीए के पक्ष में चुनावी माहौल बनाए हुए थे। लेकिन चार चरणों में मतदान होने के बाद गोदी मीडिया ख़ामोश हो गया है। आम जनता के मतदान और उसके वास्तविक रुझानों में एनडीए गठबंधन चुनाव में पिछड़ता जा रहा है।

    वर्तमान लोकसभा चुनाव में देश में सिर्फ बिहार और तमिलनाडु ही चुनावी सरगर्मी को बनाए हुए है। इसका वास्तविक कारण यह है की इन दोनों राज्यों में यूपीए गठबंधन की कमान डीएमके पार्टी के नेता एम॰के॰ स्टालिन और राजद के नेता तेजस्वी प्रसाद यादव के हाथों में है। इन दोनों नेताओं ने वास्तविक, सामाजिक और राजनीतिक मुद्दों को चुनावी प्रचार अभियान में महत्व दिया है। यह जानते हुए भी की प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में एनडीए गठबंधन का चुनावी मुद्दा धार्मिक धुर्वीकरण, झूठा जुमला, गोदी मीडिया का प्रोपेगेंडा, संवैधानिक संस्थानों का दुरुपयोग इत्यादि होगा, इसके बावजूद बिहार में तेजस्वी प्रसाद यादव ने नौकरी, बेरोज़गारी, महँगाई, प्रतियोगी परीक्षा के पेपर लीक इत्यादि मुद्दों को चुनावी मुद्दा बना दिया है। यह तेजस्वी प्रसाद यादव की राजनीतिक कुशलता को दिखाता है। इसका सबसे बड़ा उदाहरण प्रधानमंत्रीजी के परिवारवाद के मुद्दा को धराशायी करना है। जब प्रधानमंत्रीजी ने बिहार में अपने प्रथम चुनाव प्रचार की शुरुआत जमुई लोकसभा क्षेत्र से किए थे। इस दौरान तेजस्वी यादव ने प्रधानमंत्रीजी से सवाल किया था कि वे जमुई में परिवारवाद पर कुछ बोलेंगें क्योंकि इस लोकसभा क्षेत्र से लोजपा से चिराग पासवान के बहनोई चुनाव लड़ रहे हैं। इस चुनावी जनसभा के बाद प्रधानमंत्री ने परिवारवाद पर बोलना ही बंद कर दिया है।

    तेजस्वी के जॉब शो की बात प्रधानमंत्री के पटना में रोड शो पर भारी पड़ गया है। तेजस्वी यादव अपने भाषणों में कमाई , सिंचाई, दवाई, सुनवाई, कार्रवाई  वाली सरकार लाने की बात कर रहे हैं। श्री तेजस्वी को इस चुनाव में सबसे अधिक फ़ायदा उनके 17 महीनों के उप-मुख्यमंत्री कार्यकाल में किए गए कार्य से मिल रहा है। इस कार्यकाल में  तेजस्वी यादव ने पाँच लाख सरकारी नौकरी दिया, नई आईटी नीति लागू किया, नई पर्यटन नीति लागू किया, मेडल लाओ नौकरी पाओ नीति लागू किया, सरकारी अस्पतालों का कायाकल्प किया। बिहार में तेजस्वी की छवि नौकरी मतलब तेजस्वी बन गया है। यही कारण है की राजद माय समीकरण के साथ बाप समीकरण को भी इस लोकसभा चुनाव में साधने में सफल हो रहा है। तेजस्वी के सियासी समीकरण में सामाजिक मुद्दा भी शामिल है। इस मुद्दा में जातीय गणना, पिछड़ों, अति पिछड़ों, दलितों, आदिवासियों का आरक्षण की सीमा 65 प्रतिशत तक ले जाना, गैर-यादव जातियों को बड़ी संख्या में टिकट देना इत्यादि शामिल है। अपने 17 महीनों के कार्यकाल में तेजस्वी यादव ने जातीय गणना को सफलतापूर्वक करवाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाया है। इस जातीय गणना के कारण पिछड़ों, अति पिछड़ों, दलितों और आदिवासियों का आरक्षण बढ़ा है। बिहार में जातीय गणना और बढ़े हुए आरक्षण को मंडल-2 की राजनीति कहा जा रहा है। इस मंडल-2 की राजनीति से सबसे अधिक फ़ायदा राजद को मिलता दिख रहा है। अपने सामाजिक समीकरण का दायरा राजद ने बढ़ाया है। इस लोकसभा चुनाव में राजद और उसके इंडिया गठबंधन से गैर यादव जातियों को सर्वाधिक टिकट दिया गया है।

    दूसरी तरफ भाजपा ने सवर्णों को सर्वाधिक टिकट दिया है जबकि जातीय गणना के अनुसार सवर्ण (मुस्लिम सवर्ण को छोड़कर) जातियों का प्रतिशत बिहार की कुल जनसंख्या का केवल 10 प्रतिशत है। दूसरी तरफ राजद ने गैर यादव पिछड़ी जातियों पर अपना फ़ोकस केंद्रित किया है। इसका लाभ राजद को मुंगेर, नवादा, औरंगाबाद, बेगुसराय, खगड़िया, शिवहर, आरा लोकसभा क्षेत्र में मिलता दिख रहा है जहाँ का चुनाव पिछड़ा बनाम अगड़ा हो गया है। राजनीतिक विश्लेषकों और आम जनता के रुझान के अनुसार बिहार में इंडिया गठबंधन को सर्वाधिक सीट मिलता दिख रहा है। इसका श्रेय तेजस्वी यादव के सियासी समीकरण को जाता है जिस समीकरण में जनता के वास्तविक मुद्दा, सामाजिक मुद्दा और राजनीतिक मुद्दा शामिल है। इस बार के चुनाव परिणाम में तेजस्वी भव: बिहार दिखेगा और केंद्र में इंडिया गठबंधन की सरकार बनने की प्रबल संभावना है।

     

    ये लेखक के निजिविचार है. आलेख में उपयोग किए गए तथ्यों या जानकारी का प्रकाशक के सहमत या असहमत होना आवश्यक नहीं है.

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