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  • प्रधानमंत्री का कट्टा प्रेम और बिहार का दुखड़ा-डॉ योगेन्द्र

    कल भागलपुर में पुराने साथियों की बैठक हुई। संदर्भ बिहार का चुनाव था। पुराने साथियों का जिक्र इसलिए किया, क्योंकि किसी का संबंध जेपी आंदोलन से था, किसी का झुग्गी झोपड़ी आंदोलन से तो किसी का गंगा मुक्ति आंदोलन से। किसी ने दियारे में जमीन का आंदोलन चलाया था तो कोई सामाजिक न्याय आंदोलन से


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    कल भागलपुर में पुराने साथियों की बैठक हुई। संदर्भ बिहार का चुनाव था। पुराने साथियों का जिक्र इसलिए किया, क्योंकि किसी का संबंध जेपी आंदोलन से था, किसी का झुग्गी झोपड़ी आंदोलन से तो किसी का गंगा मुक्ति आंदोलन से। किसी ने दियारे में जमीन का आंदोलन चलाया था तो कोई सामाजिक न्याय आंदोलन से जुड़ा था।
    इनके पास आंदोलन और जीवन का अनुभव है। बारी बारी से साथियों ने भागलपुर जिले के सातों विधानसभा की चर्चा शुरू हुई। कौन कहां से जीतेगा? पहली चर्चा यह हुई कि कहलगांव और सुल्तानगंज विधानसभा में अगर महागठबंधन चुनाव हारता है तो इसका कारण पटना और दिल्ली के बड़े नेता होंगे। दोनों जगह कांग्रेस भी लड़ रही है और राजद भी। बिहपुर, गोपालपुर, नाथनगर और पीरपैंती में महागठबंधन ठीक ठाक है। चारों जगह जीतने की उम्मीद है। भागलपुर में बीजेपी मजबूत है। रोहित पांडे चुनाव जीत सकते हैं। अजीत शर्मा के बारे में साथियों का ख्याल यह था कि वे किसी से मिलते नहीं, न कोई काम करते हैं। पैसा बहुत है और उनके लिए विधायक का पद शोभा की वस्तु है। मजा यह था कि इन साथियों का संबंध वैचारिक रूप से गांधी, लोहिया और जयप्रकाश से संबंध है। ये लोग अब डा अम्बेडकर को भी पसंद करते हैं।‌ इन महापुरुषों की मूल धारा जाति के खिलाफ वाली है, लेकिन विधानसभा के चुनाव – विश्लेषण में जाति हावी रही। जाति और संप्रदाय के आधार पर ही जीत – हार का ठीकरा फोड़ा गया। महागठबंधन की ओर मुस्लिम, यादव, निषाद, तांती , एक हद तक कुशवाहा आदि जातियां हैं तो एनडीए की तरफ सवर्ण, कुर्मी, कुशवाहा, अंत्यंत पिछड़ी जातियां आदि हैं। दलित जातियों और अंत्यंत पिछड़ी जातियों में बिखराव है। साथियों का यह भी अंदाजा है कि बीजेपी की सीट घटेगी, जदयू की बढ़ेगी और सरकार महागठबंधन की बनेगी। मोटा – मोटी यह विश्लेषण है, इसका यह मतलब यह नहीं है कि पूरी की पूरी जातियां किसी एक पार्टी को ही वोट देंगी। उम्मीदवार की जाति के आधार पर भी खेल होगा।
    इधर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के बयान भी कम चौंकाने वाले नहीं हैं। बिहार में आते ही उन्हें कट्टा याद आया। गुजरात में इंड्रस्टी की याद आती है। उनकी भाषा पूरी तरह सड़क छाप है-’ आरजेडी ने कांग्रेस की कनपटी पर कट्टा रख कर मुख्यमंत्री पद हड़प लिया।’ उन्हें प्रधानमंत्री के पद का जरा भी ख्याल नहीं रहता। राजद बिहार में कांग्रेस से ज्यादा सीट लाता है, कांग्रेस को कम सीट मिलती है तो स्वाभाविक तौर से मुख्यमंत्री राजद का ही होगा। वे तो अपनी पार्टी के बारे में सोचें कि ज्यादा सीट रहते हुए भी उन्हें नीतीश कुमार को मुख्यमंत्री बनाना पड़ा। कट्टा तो उनकी पार्टी की गर्दन पर है। प्रधानमंत्री जी, अभी भी मौका है नीतीश कुमार को मुख्यमंत्री घोषित कर दीजिए। अगर यह घोषणा नहीं हुई तो आपकी हार का एक बड़ा कारण यह भी होगा। बीस सालों से जदयू- बीजेपी का शासन है, तब भी प्रधानमंत्री कट्टा – कट्टा चिल्ला रहे हैं। गृहमंत्री अमित शाह का तो बथान ही अलग रहता है। उनका कहना है कि तेजस्वी सीएम बने तो अपहरण व रंगदारी के विभाग खुलेंगे। अभी भी बिहार में क्या हो रहा है? चुनाव के पिछले कुछ दिनों में हत्या की जघन्य घटनाएं हुई हैं। देश में जो नीति आप चला रहे हैं, उसमें बेरोजगारी बढ़ रही है। युवकों के पास दो ही रास्ते हैं। पहला आत्महत्या क्यों और दूसरा कट्टा उठाओ। अपने नालायक बेटे को तो सेट कर दिया, बिहार के इंजीनियर, पीएच- डी होल्डर, स्नातक – मास्टर डिग्री प्राप्त युवक क्या करें? उनका पेट क्या केवल झुनझुना बजाने से या घुसपैठिए बुलाने से या हिन्दू मुस्लिम करने से भरेगा?

    (लेखक डॉ योगेन्द्र तिलकामांझी विश्वविद्यालय भागलपुर के स्नातकोत्तर हिंदी विभाग के विभागाध्यक्ष रहे हैं।)

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