मधेपुरा/ बिहार सरकार स्वास्थ्य व्यवस्था को मजबूत करने के बड़े-बड़े दावे करती है, लेकिन जमीनी हकीकत इन दावों को आइना दिखा रही है। कोसी प्रमंडल की शान कहा जाने वाला जननायक कर्पूरी ठाकुर मेडिकल कॉलेज एवं अस्पताल आज खुद ‘आईसीयू’ में नजर आ रहा है। 800 करोड़ रुपये की भारी-भरकम लागत से तैयार यह संस्थान संसाधनों की कमी और डॉक्टरों के अभाव से जूझ रहा है।
232 चिकित्सकों के स्वीकृत पदों वाले इस मेडिकल कॉलेज में वर्तमान में मात्र 51 डॉक्टर कार्यरत हैं। यानी सिर्फ 22 प्रतिशत पद ही भरे हुए हैं। शेष 78 प्रतिशत पद खाली पड़े हैं। यह आंकड़ा ही पूरे सिस्टम की पोल खोलने के लिए काफी है।
इन 51 डॉक्टरों पर दोहरी नहीं, तिहरी जिम्मेदारी है। इन्हें मरीजों का इलाज भी करना है, इमरजेंसी संभालनी है और मेडिकल छात्रों को पढ़ाना भी है। नतीजा यह है कि मरीजों को समुचित इलाज नहीं मिल पा रहा और छात्रों को गुणवत्तापूर्ण मेडिकल शिक्षा भी नहीं।
23 विभागों वाले इस मेडिकल कॉलेज की स्थिति और भी चिंताजनक है। प्रोफेसर के 23 स्वीकृत पदों के मुकाबले मात्र 3 प्रोफेसर कार्यरत हैं। एसोसिएट प्रोफेसर के 43 पदों में से 7, असिस्टेंट प्रोफेसर के 76 में से 10 तथा सीनियर रेजिडेंट और ट्यूटर के 90 पदों में से सिर्फ 31 ही उपलब्ध हैं। इतनी बड़ी कमी के बीच मेडिकल कॉलेज का संचालन किस स्तर पर हो रहा होगा, इसका अंदाजा लगाया जा सकता है।
स्वास्थ्य सुविधाओं की हालत यह है कि यहाँ एमआरआई और अल्ट्रासाउंड जैसी बुनियादी जांच सुविधाएँ भी उपलब्ध नहीं हैं। मरीज दूर-दराज के इलाकों से उम्मीद लेकर आते हैं, लेकिन हल्के से गंभीर मामलों तक को रेफर कर दिया जाता है। कई बार परिजनों को मजबूरी में निजी अस्पतालों का रुख करना पड़ता है, जहाँ आर्थिक बोझ अलग से झेलना पड़ता है।
मंगलवार को कोसी प्रमंडल के आयुक्त राजेश कुमार ने मेडिकल कॉलेज का निरीक्षण किया। निरीक्षण के दौरान उन्होंने भी स्वीकार किया कि डॉक्टरों की भारी कमी है और स्वास्थ्य सुविधाओं का अभाव स्पष्ट दिख रहा है। साफ-सफाई को लेकर भी उन्होंने नाराजगी जताई। सवाल यह है कि जब उच्च अधिकारी स्वयं कमी स्वीकार कर रहे हैं, तो अब तक समाधान क्यों नहीं निकाला गया?
यह मुद्दा कई बार विधानसभा और विधान परिषद में उठ चुका है। लेकिन स्थिति में सुधार होने के बजाय गिरावट आई है। पहले यहाँ 62 चिकित्सक कार्यरत थे, जो अब घटकर 51 रह गए हैं। यानी व्यवस्था सुधारने की बजाय और कमजोर होती जा रही है।
मेडिकल कॉलेज केवल इलाज का केंद्र नहीं होता, बल्कि यह भविष्य के डॉक्टर तैयार करने की प्रयोगशाला भी होता है। यदि फैकल्टी की इतनी भारी कमी रहेगी तो छात्रों की पढ़ाई, प्रशिक्षण और व्यावहारिक अनुभव पर सीधा असर पड़ेगा। इसका परिणाम आने वाले वर्षों में पूरे क्षेत्र की स्वास्थ्य व्यवस्था पर दिखाई देगा।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब मेडिकल कॉलेज में रेफरल अस्पताल जैसी सुविधाएँ ही मिलें, तो फिर 800 करोड़ रुपये की इस परियोजना का औचित्य क्या है? क्या यह सिर्फ भवन निर्माण तक सीमित रह गया है? क्या यह संस्थान कागजों में ही ‘मेडिकल कॉलेज’ है और जमीन पर ‘रेफरल सेंटर’?
कोसी क्षेत्र के लाखों लोगों की उम्मीदें इस मेडिकल कॉलेज से जुड़ी हैं। लेकिन वर्तमान हालात में यह उम्मीदें लगातार टूट रही हैं।
बहरहाल ये देखना दिलचस्प होगा कि आयुक्त के निरीक्षण के बाद क्या सरकार ठोस कार्रवाई करती है? क्या रिक्त पदों पर जल्द नियुक्ति होगी? क्या बुनियादी जांच सुविधाएँ बहाल होंगी? या यूं ही बदहाल रहेगा मधेपुरा का स्वास्थ्य तंत्र।














