मधेपुरा/ मधेपुरा ही नहीं, पूरे बिहार में शिशु रोग विशेषज्ञ के रूप में अपनी विशिष्ट पहचान बनाने वाले डॉ. अरुण कुमार मंडल अब हमारे बीच नहीं रहे। 3 फरवरी 2026 को पटना में इलाज के दौरान उन्होंने अंतिम सांस ली और 4 फरवरी को बांस घाट पर उनका अंतिम संस्कार किया गया। लेकिन डॉ. अरुण मंडल सिर्फ एक नामचीन चिकित्सक नहीं थे — वे सादगी, अनुशासन और ज़मीन से जुड़े जीवन के जीवंत उदाहरण थे। एक ऐसे पिता, जो चाहते थे कि उनका बेटा नाम से नहीं, ज्ञान और कर्म से बड़ा बने।
पहली सैलरी और AC लाने पर डांट
डॉ. अरुण मंडल के पुत्र डॉ. मनीष मंडल, जो वर्तमान में देश के नामचीन चिकित्सक है और आईजीआईएमएस के अधीक्षक हैं, जब पढ़ाई पूरी कर नौकरी में गए तो पहली सैलरी से उन्होंने सोचा — “पिताजी के क्लिनिक में भीषण गर्मी में इलाज होता है,पिता जी को काफी गर्मी लगती है , एक AC लगा दूं।” वे पूरे उत्साह से मधेपुरा AC लेकर पहुंचे। उन्हें लगा पिता खुश होंगे कि बेटा अपनी पहली कमाई से सुविधा दे रहा है। लेकिन हुआ ठीक उल्टा।
AC देखते ही डॉ. अरुण मंडल नाराज़ हो गए। उन्होंने बेटे को डांटते हुए कहा — “सैलरी मिली है तो सर्जरी का सामान खरीदते, किताबें लाते। ये AC क्यों लाए? मरीज पसीने में आते हैं, डॉक्टर भी पसीना बहाए — तभी सेवा का मूल्य समझ में आता है।”
यह घटना सिर्फ एक डांट नहीं थी, यह उनके जीवन-दर्शन का प्रतिबिंब था। आधुनिकता उन्हें रास नहीं आती थी। गांव, समाज, मिट्टी, खेत-खलिहान — यही उनकी असली दुनिया थी।

“अधूरी जानकारी वाला डॉक्टर नहीं चाहिए” — सख्त लेकिन दूरदर्शी पिता
जब डॉ. मनीष मंडल MBBS के पहले सेमेस्टर की परीक्षा देकर घर लौटे, तो उन्हें लगा कि पिता प्यार से हालचाल पूछेंगे।
लेकिन दरवाज़े पर ही अंतिम सेमेस्टर के सवालों की बौछार शुरू हो गई। “ये बताओ… वो समझाओ…” कुछ सवालों के जवाब न दे पाने पर पिता नाराज़ हो गए। उन्होंने स्पष्ट कहा — “मैं नहीं चाहता मेरा बेटा अधूरी जानकारी वाला डॉक्टर बने। पढ़ो, गहराई से पढ़ो… बेस्ट बनो।” एक दिन क्लिनिक में मरीजों को असिस्ट करने बुलाया। छोटी सी गलती पर फिर डांट पड़ी। घर आकर बेटे ने मां से शिकायत की — “कॉलेज से आया हूं, आराम करने नहीं दे रहे।” मां ने समझाया — “जितना जवाब दिया, वो सही नहीं था। शाम को फिर पूछेंगे। पढ़ लो।”
आज जब लोग डॉ. मनीष मंडल को एक सक्षम प्रशासक और चिकित्सक के रूप में देखते हैं, तो उसके पीछे एक सख्त लेकिन दूरदर्शी पिता की तपस्या साफ दिखाई देती है।
जमीन से जुड़े रहे, ऊंचाई पर पहुंचकर भी
प्रतिष्ठित परिवार में जन्म, पिता न्यायाधीश, दादा एमएलसी — सब कुछ था। पैसा, पहुंच, प्रतिष्ठा — कोई कमी नहीं।फिर भी डॉ. अरुण मंडल ने कभी जमीन नहीं छोड़ी। वे कहते थे — “डॉक्टर का असली धर्म सेवा है, सुविधा नहीं।” 46 वर्षों तक मधेपुरा की धरती पर बच्चों का इलाज किया। बिना NICU, बिना वेंटिलेटर, सीमित संसाधनों में अनगिनत बच्चों की जान बचाई। टीबी, मिर्गी, कालाजार और पेट रोगों के इलाज में विशेष महारत थी। वे मधेपुरा में शिशु रोग विशेषज्ञ के रूप में एक संस्थान बन गए थे।
जीवन वृत्त (संक्षेप में)
- जन्म: 28 सितंबर 1941, पटना
- पिता: न्यायाधीश स्व. आर.पी. मंडल
- दादा: स्व. भुवनेश्वरी प्रसाद मंडल (संयुक्त बिहार, झारखंड एवं बंगाल के एमएलसी)
- शिक्षा:
- मेट्रिक — जिला स्कूल, मुजफ्फरपुर
- बी.एन. कॉलेज, पटना
- 1968 में MBBS — प्रिंस ऑफ वेल्स मेडिकल कॉलेज, पटना
- MD (पीडियाट्रिक्स) — पीएमसीएच, पटना
- विवाह: 1969, उर्मिला मंडल
सेवा यात्रा
- 1971 — सोनवर्षा, सहरसा में चिकित्सा पदाधिकारी
- 1974-75 — सौर बाजार प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र
- 1976 — सिविल सर्जन कार्यालय, पटना
- 1979 — न्यू गार्डिनर अस्पताल, पटना
- 1981-1991 — सदर अस्पताल, मधेपुरा
- बाद में — मधेपुरा मंडल कारा में चिकित्सा पदाधिकारी
- 2001 — स्वेच्छा से सेवानिवृत्ति
- 1980 के दशक से 2026 तक — मधेपुरा में निजी प्रैक्टिस
सामाजिक योगदान
- अध्यक्ष — IMA, मधेपुरा (2016–2022)
- सचिव एवं चेयरमैन — रेड क्रॉस सोसाइटी, मधेपुरा
- बाढ़-सुखाड़ राहत, पोलियो वैक्सीनेशन में अहम भूमिका
- रेड क्रॉस भवन स्थापना में महत्वपूर्ण योगदान
निधन
- 31 जनवरी 2026 — मल्टी ऑर्गन फेल्योर के कारण आईसीयू में भर्ती
- 3 फरवरी 2026 — निधन
- 4 फरवरी 2026 — बांस घाट, पटना में अंतिम संस्कार
डॉ. अरुण मंडल चले गए, लेकिन अपने पीछे एक विरासत छोड़ गए — सादगी की, अनुशासन की, सेवा की और एक ऐसे पिता की, जो चाहते थे कि उनका बेटा “नाम से नहीं, काम से बड़ा डॉक्टर” बने। मधेपुरा की मिट्टी उन्हें हमेशा याद रखेगी।














